Wednesday, June 26, 2013

त्रिवेणी




बागों के कोलाहल से सन्नाटे पुकारते हैं 
मिलजुल सब संगी पखेरू शफक बुहारते हैं 

चले भी आओ कि अब तो सांझ होती है !

- वंदना

Thursday, June 6, 2013

त्रिवेणी




छोटे से हैं पंख और आकाश नापते हो 
सुना है आकाश में सितारे बांटते हो ...

ख़्वाब और हकीकत का फर्क जानते हो ??? 




-- वंदना

Friday, May 31, 2013

ग़ज़ल




कोई गीत नये  सुरों में जब गाया जायेगा 
साँसों के साज़ को कैसे भुलाया जायेगा 


धूप है कहीं छांव  कहीं अँधेरा भी होगा 
हमारे साथ कहाँ तक ये साया जायेगा 


तवक्को फकत  एक उदासी का सामान है 
ये बोझ दिल से कब तक उठाया जायेगा 


यूँ हम पर  कोई भी इल्जाम तो नही है 
मगर क्या आइने से पीछा छुड़ाया जायेगा 


न ताल्लुक कम हुआ है न राब्ता ,मगर 
न वो आ सकेगा न हमसे बुलाया जायेगा !



वंदना 



Monday, April 22, 2013

नज्म

  
पुकारा था
 तुम्हे एक रोज़
 अजीब बेबस से 
सन्नाटों में 

मुझ से ही उठकर 
एक गूँज 
मेरे ही अहम् से 
टकराकर 
बेहद शोर करती हुई 
मुझमे ही आकर 
छन से गिरी थी 

तब से कुछ नही है 
जिंदगी में सिर्फ 
एक शोर के सिवा 

तुम्हारी आवाज़ का स्पर्श 
मेरे खामोश अफ़साने 
बहुत कुछ सुनती
 रहती हूँ मैं 

यूँ ही कान दबाये !


- वंदना 


Wednesday, March 27, 2013

हम खुद से बाहर कहाँ तक जायेंगे



थक जायेंगे तो यहीं लौटकर आयेंगे 
हम खुद से बाहर कहाँ तक जायेंगे 

झंझोड़ कर जगा दे इस खाब से कोई 
वरना उम्मीदों के पर निकल आयेंगे 

कोई तस्लीम* बाकी हो दरमियाँ अपने 
इतना अगर घुटेंगे तो मर ही जायेंगे !

हर चेहरे पे लिखी है एक ही कहानी 
कितनी आँखों में खुद को पढ़ते जायेंगे 

कबूलते हैं आज अपने हिस्से का सच 
अपने आप से कब तक मुकरते जायेंगे 

जिंदगी तुझको ये पहले से बताना था 
मौत से पहले भी ऐसे सबात*आयेंगे !


वंदना 

Tasleem - greeting , Sabaat - thahraav


Sunday, February 3, 2013

यूं ही दिल के हर कोने में रहेगा




यूं ही दिल के हर कोने में रहेगा 
तेरा होना    मेरे होने   में रहेगा 

रेत एक रोज़ आईना हो  जाएगी 
ये समंदर साहिल धोने में रहेगा 

खुशबुओं के पर निकल आयेंगे
अब सहरा गुलाब बोने में रहेगा 

फिदरत अपनी बदल  दे ऐ इश्क 
कोई  कब तक पाने खोने में रहेगा 

मौन की तहरीरें गढ़ी जा रही हैं 
दिल टूटी कड़ी  पिरोहने में रहेगा 



- वंदना 

Thursday, January 17, 2013

फांसले


फांसले 
जिन्दगी कि जड़ो में 
गहराती हुई 
एक परिभाषा 


फांसला जमीं आसमां के बीच का 
फांसला डूबते सूरज और उगते चाँद के बीच
उनकी सीमाए तय करता

लेकिन इन फासलों में
ही सांस लेता है
सबका अपना अपना वजूद
वो हैं क्योकिं फासले हैं


अच्छे लगने लगे हैं
मुझे ये फासले

फासलें राही और मंजिल के
सपने और हकीकत के
फासले शफक और उफक के
फांसले उम्मीद और भरम के

फांसले ..
एक नदी के दो किनारों के

फासले हैं ...तो किनारे हैं
किनारें हैं ..तो बहाव है
बहाव है .. तो नदी है
नदी है ...तो  तृप्ति है


और जीवन की इसी
तृप्ति को मैंने
जिया हैं इन फासलों में
जिनमे सांस लेता
एक पहला पहला  प्यार
मेरी अहसासों की जीवितता को
हमेशा धड़कने बख्सता रहेगा ...

और हम अपनी अपनी
जगह लिए हुए
 यूँ  ही रहेगें
......
 "मैं " .......... .... .....".तुम "
ये फांसलें !




- वंदना



























तुम्हे जिस सच का दावा है  वो झूठा सच भी आधा है  तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती  जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं  कोरे मन पर महज़ लकीर...