Friday, May 31, 2013

ग़ज़ल




कोई गीत नये  सुरों में जब गाया जायेगा 
साँसों के साज़ को कैसे भुलाया जायेगा 


धूप है कहीं छांव  कहीं अँधेरा भी होगा 
हमारे साथ कहाँ तक ये साया जायेगा 


तवक्को फकत  एक उदासी का सामान है 
ये बोझ दिल से कब तक उठाया जायेगा 


यूँ हम पर  कोई भी इल्जाम तो नही है 
मगर क्या आइने से पीछा छुड़ाया जायेगा 


न ताल्लुक कम हुआ है न राब्ता ,मगर 
न वो आ सकेगा न हमसे बुलाया जायेगा !



वंदना 



7 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज शनिवार (01-06-2013) बिना अपने शब्दों को आवाज़ दिये (चर्चा मंचःअंक-1262) में "मयंक का कोना" पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. तवक्को फकत एक उदासी का सामान है
    ये बोझ दिल से कब तक उठाया जायेगा

    बेहतरीन गज़ल

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  3. बहुत बढिया ... सुन्दर प्रस्तुति..

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  4. bahut bahut abhaar aap sabhi ka .....:)

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  5. Aha!!bahut sundar gazal!! :)

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  6. धूप है कहीं छांव कहीं अँधेरा भी होगा
    हमारे साथ कहाँ तक ये साया जायेगा ,,,,
    जब तक रौशनी है ये साया साथ देगा ... नहीं तो कौन रहता है अंधेरे में साथ ...
    लाजवाब गज़ल है ..

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  7. "न वो आ सकेगा न हमसे बुलाया जाएगा"आह !

    खूबसूरत !

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