Saturday, June 25, 2011

इबादत को मैं एक भरम लिख दूं




सोचती हूँ इस फ़साने का अब कोई अदम लिख दूं 
क़त्ल ए किरदार से पहले एक आखरी नज्म लिख दूं ....

जिंदगी नयी शर्तों पर फिर जीने के मोहलत ले आयी ...
इसे साँसें बख्शने  से पहले मरता हुआ गम लिख दूं 

ये सदायें ,चुभन ,बेचैनिया गर  बेसबब हैं तो क्यूं हैं ?
कोई जवाब दे ,तो इस इबादत को मैं  एक भरम लिख दूं   

चलो मान लेते हैं दिल को दिल से कोई राह नहीं होती 
उदास  है हवा.. तो क्यूं अपने मौसम मैं नम लिख दूं 

इश्क, मोहब्बत या महज एक पागलपन ,जो भी हो 
जी चाहता है ,हर एक आरजू पे मैं  सारे जनम लिख दूं 

वंदना 



20 comments:

  1. ओह्ह्ह....आखिरी शेर तो गज़ब का है ....
    मज़ा आ गया सुबह सुबह...
    मैं चला फेसबुक पर ढिंढोरा पीटने....:D

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  2. हृदयस्पर्शी ग़ज़ल।

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  3. वाह ..बहुत खूबसूरत गज़ल

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  4. wow!!!!!!!!

    kitne syahiyaan hamne giraye kitne panne humne kharach kar di //

    sochta hun koi mila de mujse humein ab, kuch apne baaren me likh dun//

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  5. बहुत खूब ... क्या लाजवाब गज़ल है ... गहरा एहसास लिए ...

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  6. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (27-6-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  7. बहुत सुन्दर...क्या बात है..?

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  8. wah bahut badiyaa gajal.aakhari sher ne to dil ko choo gayaa.badhaai sweekaren.

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  9. बहुत सुन्दर...बधाई

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  10. बहुत खूब ! हरेक शेर बहुत उम्दा..

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  11. इस भावपूर्ण रचना के लिए तहे दिल से दाद कबूल करें

    नीरज

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  12. vandna ji
    bus kya kahen aapse

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  13. बहुत गहरी संवेदनाऐं।
    दिल को छू कर निकल गई।

    दर्द को शब्दों के सांचे में ढाल दिया है ।

    आभार अफसोस की बहुत देर से आपके बलॉग पर आ सका।

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  14. सुन्दर रचना ... भावपूर्ण

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