बरसों के बाद यूं देखकर मुझे
तुमको हैरानी तो बहुत होगी
एक लम्हा ठहरकर तुम
सोचने लगोगे ...
जवाब में कुछ लिखते हुए
तुम्हारी उँगलियाँ लड़खड़ाएंगी
बचपन कि किताब के कई धुंधले वर्क
तुम्हारे मन कि बेचैन हवा में उड़कर
आँखों में उतर आयेंगे शायद
तुम्हारे कई शरारती से सवाल
तुमको हैरान करेंगे..
फिर एक अजीब इत्तेफाक का
तुम इसे नाम भी दोगे..
मगर तुमको कहाँ एहसास भी होगा
कि बचपन कि दहलीज़ से
उम्र के इस पड़ाव तक
मैंने इस पल को हमेशा
अपनी उम्मीदों में जिया है
तुमको खोजा है अक्सर
नींदों कि भटकन में
तुमको पाया है अक्सर
सपनो कि सरगम में..
इल्तेज़ा है बस यही
तुमसे ऐ मेरे दोस्त
तुमसे ऐ मेरे दोस्त
इस मुलाक़ात को तुम
आखिरी मुलाक़ात न करना !
~ वंदना


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