Saturday, August 24, 2013

ग़ज़ल



पथराई सी आँखों मे आँसू बो रहा है 
मुझमे न जाने कौन बैठा रो रहा है

 मुझसे ये मेरे ही वजूद कि लड़ाई है 
मैं उसको और  वो मुझे  खो रहा है

करीब आती हुई मंजिलों का क्या करूँ 
की मेरा जूनून ऐ सफ़र खो रहा है 

न बाकी है दरिया में अब हलचल कोई 
प्यासी मछलियों का दमन हो रहा है 

हम कटते हुए शज़र पे छाँव को रोये 
 दुःख उस परिंदे का जो बेघर हो रहा है 


धुंधलाने पे आ गया है अब वही चेहरा 
एक उम्र आँखों के खामेजां  जो रहा है 

लरजती गरजती हवाओं से ये कह दो 
 बादल कि गोद में आज महताब सो रहा है 


चल ही गये अपनी भी दुआओं के सिक्के 
मुरादों में हमारी भी अब असर हो रहा है 


वंदना 





8 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि का लिंक आज रविवार (25-08-2013) को पतंग और डोर : चर्चा मंच 1348
    में "मयंक का कोना"
    पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बेहतरीन गजल...
    :-)

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  3. न बाकी है दरिया में अब हलचल कोई
    प्यासी मछलियों का दमन हो रहा है

    बेहतरीन वंदना जी

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  4. सुंदर गजल

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  5. मुरादों का असर हो रहा है तो थोडा खुशनुमा भी लिखें आप!

    जारी रखिये ..

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  6. न बाकी है दरिया में अब हलचल कोई
    प्यासी मछलियों का दमन हो रहा है

    बेहतरीन गजल वंदना जी

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