Friday, May 1, 2009

न गम है .. न खुशियों से किनारा है , ख़ुद की जीत की खातिर हमने ख़ुद को हरा है

जब सुअम से अनजान थी तो समझदार कहलाती थी , खुद की परख ने हमें पागल बनाया है
जिन्दगी तो हंसकर जलाती रही , तजुरबो ने अब चलना सिखाया है
ऐ आस्मां इन बदलियों से कहदे .. मेरी अटरिया से होकर न गुजरे
समंदर की लहरों से अब मैंने रिश्ता बनाया है
मिटाकर खुद को कागज की कश्ती की तरह
मैंने खुद को दुआ की तरह पाया है..

1 comment:

  1. तजुरबो ने अब चलना सिखाया है,
    मैंने खुद को दुआ की तरह पाया है.

    padh kar accha laga vandana!

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