Friday, May 1, 2009

पगली

उम्र के ये कैसे मोड़ आ गए , मेरी मासूमियत कहाँ नीलम हो गयी
मेरी मुस्कुराहटो पर गंभीर निगाहें तन गयी ,नादानीया मेरी बदनाम हो गयी
मेरे चेहरे पर छलकती उदासी को भोलापन समझा समझदारों ने
मेरी तरह नादान थे वो जिन्हें इन सवालों की पहचान हो गयी
(वंदना)

2 comments:

  1. thoda sambhal ke kadam rakho dear:-) slip hone ke chances jayada hain:-) anyways..... Nice poem indeed

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  2. bahut accha
    मेरे चेहरे पर छलकती उदासी को भोलापन ye panktiya to atyant hee mukhar hain .

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