Wednesday, November 12, 2014

ग़ज़ल




नींद टूटी ख़्वाबों का सिलसिला टूटा 
चेहरा धुंधलाने लगा तो आइना टूटा

हर मुसाफिर अपने लिए चल रहा था 
किसको मालूम कब वो काफिला टूटा

परिंदे उड़ गये थे कर के वीरान इसे 
अपनी मर्जी से नही ये घोंसला टूटा

गिरकर संभलना चींटी का स्वभाव था 
दीवार ही गिरने लगी तो होंसला टूटा

सबके ही काँधे पे अना का बोझ था 
जब मगर थकने लगे तो कारवाँ टूटा


~ वंदना 
10/18/14

10 comments:

  1. बेहतरीन रचना उतने ही खूबसूरत भाव.

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (14-11-2014) को "भटकता अविराम जीवन" {चर्चा - 17976} पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    बालदिवस की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. हर मुसाफिर अपने लिए चल रहा था
    किसको मालूम कब वो काफिला टूटा ..
    लाजवाब ... गज़ब का शेर है ... पूरी ग़ज़ल बहुत उम्दा ...

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  4. vandna ji aapki kalam ko jyada padhne ke liye apki pustak फिरता है मन तारा तारा khan se uplabdh hogi hume

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    Replies
    1. Sanjay ji ..Aap apna pata mujhe inbox kar dijiye. main aapko bhej doongi. Bharat me uplabh nhi karayi gyi hai abhi ..na hi online hai .

      email - singh.vandana498@gmail.com

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