Thursday, October 2, 2014

नज़्म




वक्त का पिंजर 
परिंदे  को अक्सर 

छोड़ देता है कुछ पल 
 भटकने के लिए 


मगर परवाज़ इस कदर 
बोझिल है की 
सिमटके रह जाती है 
माज़ी के दरीचों में  

अक्सर अपने ही 
सायो  से टकराकर 
जब गिर पड़ता है 
तो समेटता हुआ अपने आप को 
 यूं कह कर  उठ जाता है

प्यार ,दिल में जिन्दा रहता है 
बस आँखों में मर जाता है !


~ वंदना 



1 comment:

  1. वंदना जी ....बहुत ही खुबसूरत रचना रची है आपने..बधाई स्वीकारें.

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