Tuesday, August 5, 2014

नज़्म



जी चाहता है पुकार लूँ 
 तुमको ख़ामोशी के उसपार से
हर आजमाइश से आगे बढ़कर 
हर खलिश को रोंधते हुए
खुद से किये हुए हर एक 
समझोते  को खत्म कर 
बस एक बेपरवाही में ।

खुद में सिमटना  संजीदगी है
 या फिर एक जकड़न का नाम. 
बंधता जाता है इंसान 
अपनी ही बुनी हुई गिरहों से । 

समझ नही पा रही हूँ मैं 
खुदगर्जी और बेबसी के बीच का
 ये फर्क जो मेरे ज़हन में 
एक लकीर की तरह 
मुक्कमल हो रहा है। 

बंट गयी हूँ मैं
 अपने ही भीतर कई हिस्सों में।  
मुझे इसका अफ़सोस भी है 
और इल्म भी,  कि  

" मजबूत होता है 
मोहब्बत की आकर्ति 
और आकर्षण में 
बंधा हुआ इंसान
  और इस बंधन से टूटकर गिरा हुआ 
उतना ही खोकला और बेबस "

~ वंदना 






11 comments:

  1. इश्क के बेबसी से बंधन मुक्त होने की चाह दरअसल असल मुहब्बत है ...
    गहरा एहसास लिए है नज़्म ....

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  2. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 07/08/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

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  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 07-08-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1698 में दिया गया है
    आभार

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  4. खुदगर्जी और बेबसी के बीच का
    ये फर्क जो मेरे ज़हन में
    एक लकीर की तरह
    मुक्कमल हो रहा है। पंक्तिया नहुत भाव पूर्ण |
    उम्दा रचना |

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  5. बंट गयी हूँ मैं
    अपने ही भीतर कई हिस्सों में।
    मुझे इसका अफ़सोस भी है
    और इल्म भी, कि

    " मजबूत होता है
    मोहब्बत की आकर्ति
    और आकर्षण में
    बंधा हुआ इंसान
    और इस बंधन से टूटकर गिरा हुआ
    उतना ही खोकला और बेबस " .....बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति
    सावन का आगमन !
    : महादेव का कोप है या कुछ और ....?

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  6. puri kavita bhavpurn....par antim kuch lines dil ko chuu gayi

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  7. बहुत सुन्दर भावप्रणव रचना।

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  8. बहुत अच्छी प्रस्तुति।

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  9. बेहतरीन ...

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