Wednesday, June 18, 2014

त्रिवेणी



मुमकिन है पानी पर पैरों को जमाना 

तपती रेत का एक रोज़ आईना हो जाना 

बस तुम खुद से बहुत दूर न निकल जाना !

वंदना 


5 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 19-06-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1648 में दिया गया है |
    आभार |

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  2. वाह!!! क्या कहने, बेहद उम्दा

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  3. वाह ... क्या बात कही है ... खुद सद दूर निकलना आसान कहाँ ...

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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  5. खूबसूरत अल्फ़ाज़...

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तुम्हे जिस सच का दावा है  वो झूठा सच भी आधा है  तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती  जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं  कोरे मन पर महज़ लकीर...