Thursday, May 29, 2014




दिल रोया है 
उन अजीब लम्हों को याद करके ....

जब दिल के दरवाजे पर 
तेरी दस्तक से

सोयी ख्वाहिशे 
इस तरह 
तिलमिला कर जागी थी ....

मानों किसी ने 
ठहरे पानी में 
पत्थर फेंका था ,,

कोई दुआ करे
 के उन्हें फिर नींद आ जाये


शायद अब खुदा तक 
मेरी अर्जी नहीं जाती ...

4 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (30-05-2014) को "समय का महत्व" (चर्चा मंच-1628) पर भी है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सुन्दर प्रस्तुति...

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  3. बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.....

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  4. यादें पीछा कहाँ छोड़ती हैं ... बहुत उम्दा ...

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