Thursday, December 12, 2013

छणिकाएं




गुम गये शायद 

वो सिक्के इबादत के 
दौडती जिंदगी ने जो 
ठहरे पानी में फेंके थे !!

*********



खुद को भूल बैठे हैं 

तुमको गवां बैठे हैं 
एक दोस्त कि कमी 
अक्सर खलेगी हमको 
आवारगी के दिन 
जब भी याद आयेंगे !!


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टूटे तो बहुत मगर 

घुटनो पे नही आए 
इश्क में सस्ते कोई 
सौदे नही भाए 
अपने भी हिस्से आयी है 
इतनी बेगुनाही तो 


~ वंदना







7 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (13-12-13) को "मजबूरी गाती है" (चर्चा मंच : अंक-1460) पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बेहतरीन अंदाज़..... सुन्दर
    अभिव्यक्ति.......

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  3. बहुत बेहरतीन

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  4. लाजवाब हैं तीनों क्षणिकाएं ...

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  5. behtreen rachna...

    Please visit my site and share your views... Thanks

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  6. बहुत सुंदर रचना !!

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