Thursday, December 12, 2013

पतझड़ के पंख रंगने को !






जैसे भरता है कोई 
अपने खालीपन को 
यादों कि झिलमिल से 


जैसे   पार करना होता है 
कोई सन्नाटा
 एक अतीत के शोर के साथ 

जैसे देखा करते हैं परिंदे  
पतझर से बाजी हारते 
पेड़ों पर अपने बिखरते 
घरोंदों को 

जैसे छोड़ता जाता है पतझड़ 
पीले पत्तों पर अपने 
परों के निशाँ 

जैसे ले जाती है बरसात 
रंग तितलियों से 
आसमां में एक इंदधनुष 
रचने को 

 कुछ रंग चुराएँ थे  मैंने भी 
उन गुजरी हुईं बहारों से 
पतझड़ के पंख रंगने को ! 

~ वंदना 






3 comments:

  1. बेहतरीन अंदाज़..... सुन्दर
    अभिव्यक्ति.......

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  2. बढ़िया भाव सटीक अभिव्यक्ति-
    आभार आपका-

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  3. बहुत सुन्दर रचना..

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