Sunday, December 8, 2013

त्रिवेणी,



वक्त समझ कर कैद किया था मुट्ठी में कुछ और निकला 
हमने लफ़्ज़ों में मौन बुना था जन्म जन्म  का शोर निकला 

शायद जिंदगी बस ऐसी ही  कुछ पहेलियों का नाम हैं !      


 ~ वंदना 









3 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (09-12-2013) को "हार और जीत के माइने" (चर्चा मंच : अंक-1456) पर भी है!
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. Jindagi hai hee ek paheli. kis pal kya ho jata hai kaun jan sakta hai.

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  3. वाह बहुत खुबसूरत. मेरी नई पोस्ट में आपका स्वागत..

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