Tuesday, November 20, 2012

ग़ज़ल




हो जाए ऐसा खुदा न खास्ता तो 
याद आये भूला हुआ रास्ता तो 

नींदों में हमें है चलने कि आदत 
अगर शिद्दत से वो पुकारता तो

खामोशियों को जुबां हमने जाना 
कयामत ही होती गर बोलता तो

होता यूँ के टूटते बस भरम ही 
गर जाते में उसको टोकता तो

उसी कि नजर का जवाब हम थे 
आईने में खुद को निहारता तो

मर के भी मैं जी उठूंगा शायद 
दिया अपना जो उसने वास्ता तो

9 comments:

  1. बहुत बढ़िया गजल |

    आपके इस प्रविष्टी की चर्चा बुधवार (21-11-12) के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
    सूचनार्थ |

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  2. बहुत खूब .... आईने में देखता तो ... खूबसूरत गज़ल

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  3. क्या बात है..

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  4. बहुत ही सुन्दर गजल...
    :-)

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  5. बेहतरीन ग़ज़ल ....

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  6. बहुत सुन्दर भावप्रणव प्रस्तुति!

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  7. वाह वंदना जी क्या बात है बेहद सुन्दर ग़ज़ल
    अरुन शर्मा - www.arunsblog.in

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  8. वंदना जी आपकी इस रचना को
    कविता मंच और हमारा हरयाणा ब्लॉग पर साँझा किया गया है

    संजय भास्कर
    http://kavita-manch.blogspot.in
    http://bloggersofharyana.blogspot.in

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