Sunday, February 12, 2012



जितना खुद में सिमटते गए
उतना  ही हम  घटते गए 

खुद को ना पहचान सके तो 
इन आईनों में बँटते गये 

सीमित पाठ पढ़े जीवन के  
उनको ही बस रटते गए 

वक्त कि लाठी छोड़ छाड़ कर 
 उम्र कि राह बस चलते गये  

प्रीत न साँची पढ़ पाए तो 
रीतों के वरक पलटते गए 

जितना बढ़ा आकार नदी का 
उतना , किनारे कटते गये 


- वंदना 


16 comments:

  1. बहुत ही अच्छी......

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  2. जितना बढ़ा आकार नदी का
    उतना , किनारे कटते गये


    बहुत खूब ... अच्छी प्रस्तुति

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  3. shuru ki char panktiyan bahut bhaeen ...

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  4. बेहतरीन गीत...बधाई स्वीकारें

    नीरज

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  5. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 16-02-2012 को यहाँ भी है

    ...नयी पुरानी हलचल में आज...हम भी गुजरे जमाने हुये .

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  6. जितना बढ़ा आकार नदी का ... किनारे कटते गए , बहुत ही गहरे भाव

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  7. simit path pade jeevan ke, very nice lines.

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  8. जितना बढ़ा आकार नदी का
    उतना, किनारे कटते गए..

    बहुत सुन्दर...

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  9. बेहतरीन सुंदर गीत,..बहुत अच्छी प्रस्तुति,...बधाई
    MY NEW POST ...कामयाबी...

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  10. बहुत बढ़िया रचना.... वाह!
    सादर.

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  11. बेहतर रचनात्मक प्रस्तुति .....!

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  12. बेहतर रचनात्मक प्रस्तुति .....!

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