Wednesday, February 22, 2012

ख़ुदखुशी !!!



ये कैसी नींद थी 
कि ये कैसा ख़्वाब था 

क्या था ..कौन था 
एक साया था ..
या भरम था  ? 

एक सबा का झौका 
या कोई तूफ़ान था ?

बुझते चिरागों का 
धुंआ महसूस होता है 
क्या कोई रौशनी थी यहाँ 
या यही फैला हुआ अँधेरा था ?


रंग फीके हो गए 
या तस्वीरे धुंधला गयीं 
चेहरे खो गए या 
आईने बदल गए है ?




ये कैसा ठहराव है ?
ये कैसा सन्नाटा है ?



कोई  सफर पर निकला तो है 
मगर  कुछ भूल आया है ?


क्या कोई चुरा ले गया 
जीने का सब जरूरी सामान 
सपने , तमन्ना ,आरजू 
धडकन ,..साँसे ...
शायद जीने के बहाने भी !


 या फिर अंतर्मन के इस 
विषैले  सागर में किसी ने 
डूबकर खुदखुशी कि  है ?


- वंदना 

17 comments:

  1. तैरता उतराता शांत लम्हा
    ख़ुदकुशी की शक्ल अपनी सी लगती है ....

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  2. या फिर अंतर्मन के इस
    विषैले सागर में किसी ने
    डूबकर खुदखुशी कि है ?

    अन्तर्मन की व्यथा ...

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  3. ये खुदकशी भी तो अपने आप नहीं आती ... उठाना होता है ... कर्म करना होता है ...

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  4. शुक्रवार के मंच पर, तव प्रस्तुति उत्कृष्ट ।

    सादर आमंत्रित करूँ, तनिक डालिए दृष्ट ।।

    charchamanch.blogspot.com

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  5. गहन अभिवयक्ति......

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  6. बहुत ही सुन्दर भाव| धन्यवाद।

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  7. खूबसूरत भावपूर्ण रचना, बधाई

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  8. बहुत सुंदर भावपूर्ण और मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति...

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  9. Waaaaah....bahut hi dhansu....zor se padhne me aur bhi maza aaya.

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  10. kya khoob likha hai vandana ji...prabhawit karti hai aapki lekhani..

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  11. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
    लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
    --
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर लगाई गई है!

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  12. क्या बात है, पीड़ा का अतिरेक.

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  13. सुन्दर रचना , बधाई ,
    सादर

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  14. man me bhaavnaon ka toofan umadta hai to kalam chalti hai ....man me umadte bhaavon ko achcha roop diya hai rachna ne.

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