Wednesday, May 30, 2012

त्रिवेणी




एक अजीब सी बेचैनी अजीब सी  खुमारी है 

क्या छूट रहा है कि मन बड़ा भारी भारी है 


बता दे जिन्दगी अब किस सफर कि तय्यारी है ?


-वंदना 

4 comments:

  1. ये त्यारी तो किसी से मिलने की लगती है। बहुत खूब !

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  2. बहुत सुंदर.......................

    गुलज़ार जी याद आ गए.....

    अनु

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  3. जाहिर करने के लिए शब्दों के हुजूम नहीं होते .... आपकी लेखनी कहती है

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  4. कम शब्दों में बहुत कुछ.....सुन्दर...

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खुद को छोड़ आए कहाँ, कहाँ तलाश करते हैं,  रह रह के हम अपना ही पता याद करते हैं| खामोश सदाओं में घिरी है परछाई अपनी  भीड़ में  फैली...