Saturday, May 12, 2012

त्रिवेणी








मुझे ढूंढती है जैसे मेरी ही तलाश कोई 

साया सा चल रहा है  आसपास कोई... 



ये मेरे भरम हैं या कि आहट तुम्हारी ??










- वंदना 

9 comments:

  1. बहुत खुबसूरत......

    ReplyDelete
  2. सुन्दर प्रस्तुती |
    आभार आपका ||

    ReplyDelete
  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

    ReplyDelete
  4. सुंदर.......

    ReplyDelete
  5. खुद को ढूँढने की तलाश ताउम्र चलती है.

    सुंदर विचार.

    ReplyDelete
  6. भ्रम और आहटों पर हमारी बहुत सी उम्मीदें जीती हैं।
    सुंदर भाव।

    ReplyDelete

गीत

नयन हँसें और दर्पण रोए  देख सखी वीराने में  पागलपन अब हार गया खुद को कुछ समझाने में  -- काली घटायें  घुट घुट जाएँ  खार...