Saturday, May 5, 2012

त्रिवेणी



कितने रंग संजों डाले महज़ इक ख़्वाब कि ताबीर में 
जाने क्या क्या गढ़ बैठी , मैं पागल एक तस्वीर में 


कच्चे पक्के इन रंगों का ही खेल जिन्दगी है शायद !




वंदना 





9 comments:

  1. यह रंगों का ही खेल है ॥ सुंदर अभिव्यक्ति

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  2. rango ka khel...sundar bhaav...

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  3. गहरी अभिव्यक्ति गहरी सोच

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  4. क्या खूभ चितेरा है ऊपर वाला और क्या खूब रंग भरे हैं उसमें जिंदगी ने!
    आपकी भी कामना कुछ वैसी सी! सुंदर अभिवयक्‍ति!

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  5. इन रंगों से ही तो नए रंग भी बनते हैं नए ख़्वाबों की तरह ...
    बहुत खूब लिखा है ...

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  6. सही कहा आपने

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  7. वाह ...बहुत खूब।

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खुद को छोड़ आए कहाँ, कहाँ तलाश करते हैं,  रह रह के हम अपना ही पता याद करते हैं| खामोश सदाओं में घिरी है परछाई अपनी  भीड़ में  फैली...