Sunday, April 22, 2012

गज़ल



जिंदगी ये तेरे गम  क्यूं अजब से हो गये 
जो भी महरबां थे ,वो आज रब से हो गये.. 

निकले थे सफ़र पे हम खुद को तलाशने 

कैसा मुकाम आया कि दूर सब से हो गये ..

रोज कुछ नया सा  यूँ लिखा जिंदगी ने 

कि सब पुराने सफ़हे  बे सबब से हो गये..

ठहरे हुए पानी  से   कोई दुआ  नही मांगी 

अपनी इबादतों के सिक्के जब से खो गये ..

सुनकर पुकार उसने मुड़कर भी न  देखा
इतने बुरे भी हम न  जाने कब से हो गये ...




- वंदना 

10 comments:

  1. सुन्दर :)

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  2. bahut sundar,bhavmayi abhivayakti....

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  3. वाह ! बहुत ही खूबसूरत गज़ल! हर शेर बेहद खूबसूरत !

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  4. सुनकर पुकार उसने मुड़कर भी न देखा ,
    इतने बुरे भी हम न जाने कब से हो गए ।
    बहुत सुन्दर गजल ....!

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  5. you speak my heart....good one !!

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