Tuesday, October 4, 2011

ग़ज़ल ..






कितनी भी करो नेकी कम पड़ ही जाती है 
घना हो बोझ तो  गर्दन अकड़ ही जाती है 

कितनी ही सहूलियत से बुनो कोई भी रिश्ता 
कहीं ना कहीं आखिर गाँठ पड़ ही जाती है 

जहन कि दीवारों पर  कुछ जख्म बाकी हैं 
जमीं हिलती हैं तो दरारें भी पड़ ही जातीं हैं 

भरम से परदे उठे  तो जुस्तजू पे आ गिरे  
फुलवारी उजडती है तो तितली उड़ ही जाती है 

नदी हो या जिन्दगी,है अपने सफ़र पे कायम 
जिधर से रास्ता देखे उधर को मुड ही जाती है 

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वंदना 

7 comments:

  1. बहुत सार्थक कविता| आप को दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएँ|

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  2. बहुत खूब ! बहुत मर्मस्पर्शी गज़ल...विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं !

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  3. marmsparshi aur jeewan katu modo ka lekha jokha karti sunder abhivyakti.

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  4. बहुत खूब ... लाजवाब शेर ...

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  5. NICE.
    --
    Happy Dushara.
    VIJAYA-DASHMI KEE SHUBHKAMNAYEN.
    --
    MOBILE SE TIPPANI DE RAHA HU.
    ISLIYE ROMAN ME COMMENT DE RAHA HU.
    Net nahi chal raha hai.

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  6. बहुत ही प्यारी और सुन्दर रचना...

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  7. सुन्दर..सुन्दर...हर एक शेर बेहद खूबसूरत हैं!!

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