Thursday, October 6, 2011

ग़ज़ल






पलके झपकूं तो कोई ख़्वाब आये शायद
आज महताब जमीं पे उतर जाये शायद !

आँख से बह गया है काज़ल ये तमाम ,
आईना फिर से आज मुस्कुराये शायद !

सिसकियाँ खामोश अब होने लगी हैं,
दिल ए पागल अब कुछ गुनगुनाये शायद !

जाने वाले को कहो जरा पलटे तो सही,
न तड़पकर कोई आवाज़ लगाये शायद !

जीने कि तलब पल पल मर के जान ली ,
अब कद्र ए जिंदगी भी समझ आये शायद ! 

वन्दना 

4 comments:

  1. आँख से बह गया है काजल तमाम
    आईना फिर से आज मुस्कुराए शायद

    वाह!
    उम्दा ग़ज़ल...
    सादर बधाई...

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  2. बहुत सुन्दर गजल.....

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  3. खुबसूरत ग़ज़ल....

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खुद को छोड़ आए कहाँ, कहाँ तलाश करते हैं,  रह रह के हम अपना ही पता याद करते हैं| खामोश सदाओं में घिरी है परछाई अपनी  भीड़ में  फैली...