Tuesday, September 27, 2011

एक आवारा परिंदे कि उड़ान होता गया




एक आवारा परिंदे कि उड़ान होता गया ,
दिल को हवा लगी आसमान होता गया.. 

कितने मंजर छूट गए उस बेख्याली में,
मैं खुद से भी कैसा अनजान होता गया..

ख़्वाब न हकीकत वो कुछ भी तो न था ,
महज़ इक  भरम का गुमान होता गया.. 

सुधियों को सिखाकर एक गूंगी परिभाषा , 
इक तस्सवुर दिल का महमान होता गया.. 

वरक दर वरक*   दुआएं  बहुत सी पढीं, 
हर इबादत पे दिल ये बेईमान होता गया..

जब्त कि रगों में  इज़्तराब*  ठहर  गया , 
इश्क एक पागल कि मुस्कान होता गया.. 

रफाकत का हमने भी दामन नही छोड़ा , 
खुदगर्ज कोई मुझमे पशेमान* होता गया..

प्यासे समंदर कि सब मछलियां बींद डाली,
जाता हुआ मौसम तीर ए कमान होता गया !!



- वंदना 

वरक दर वरक = पन्ने दर पन्ने 
इज़्तराब = बेचैनी / तड़प 
पशेमान = शर्मिंदा 


10 comments:

  1. भावभीनी गजल को बधाई सम्मान ,,,, अच्छा लगा /

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  2. खुबसूरत रचना....

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  3. बहुत खूबसूरत गज़ल ..उड़ान कायम रहे .

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  4. बहुत बढ़िया!
    आपको सपरिवार
    नवरात्रि पर्व की मंगलकामनाएँ!

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  5. सुन्दर ग़ज़ल.
    हर शेर बढ़िया.

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  6. नई पुरानी हलचल से इस पोस्ट पर आना हुआ.

    आपकी खूबसूरत प्रस्तुति दिल को छूती है.

    नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ.

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  7. बहुत ही खूबसूरत गजल।

    सादर

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