Sunday, September 25, 2011

गिरहें





कुछ गिरहें जिनमे  
बंधी हुई  हूँ  मैं 
जो जकड़े हुए हैं 
 मेरे वजूद को 

जिन्हें ...जब कभी 
धीरे धीरे सुलझाने 
कि कोशिस करती हूँ 
बिखरने लगती हूँ 

मेरे साथ बिखरता है 
....मेरा विश्वास 
मेरे साथ बिखरती है 
.....मेरी आस्था, 
बिखरने लगता है 
मेरा नजरिया, 
बिखरने लगती है 
......मेरी सोच ,
बिखरने लगता है 
-- मेरा वजूद   !

चाहती हूँ ...जिन्दगी भर 
ये गिरह मुझे ...
यूँ ही बांधकर रखे 
मैं कभी बिखरने न पाऊं 

क्योकि गिरहों के
 इस बंधन में ही मैंने 
एक आज़ाद रूह ..
महसूस कि है  !!

- वंदना 

10 comments:

  1. ऐसी गिरह से कौन निकलना चाहेगा.... बहुत ही खुबसूरत....

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  2. बहुत भावभरी रचना।

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  3. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है! यदि अधिक से अधिक पाठक आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  4. खूबसूरत भावमयी सुन्दर रचना...

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  5. क्यूँ कि गिरहों के बंधन मैं ही मैंने एक आजाद रूह महसूस की '
    बहुत सुन्दर पंक्तिया |सुन्दर भाव पूर्ण रचना |
    आशा

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  6. बहुत ही सुन्‍दर भावमय करते शब्‍दों का संगम ।

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  7. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति !!!
    "ये गिरह मुझे यूँ ही बंधकर रखे
    मै कभी बिखरने न पाऊ "

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  8. चाहती हूँ... जिन्दगी भर
    ये गिरह मुझे यूँ ही बाँध के रखे....

    सुन्दर भाव भरी रचना...
    सादर...

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  9. एक बार फिर आपके शब्द कौशल ने मन्त्र मुग्ध कर दिया...नमन है आपकी लेखनी को...अद्भुत

    नीरज

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