Wednesday, September 7, 2011

त्रिवेणी




कुछ परिंदे दूर कहीं से  इस पेड़ पर रोज आते हैं 
हैरत कि बात है इस पेड़ पर कोई फल भी नहीं 

शायद बेनाम रिश्ते इन्ही डालियों पर बसते हैं !

- वंदना 

10 comments:

  1. इतनी खूबसूरत अभिव्यक्ति के लिए मेरी बधाई स्वीकार करें !....वंदना जी

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  2. बहुत ही सुन्दर भाव सहेजा है ...बधाई वन्दना जी..

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  3. kya fark padta hai phal hain ya nahin , us basere se we dur to nahin hote

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  4. ्वाह ………चंद शब्दों मे बहुत गहरी बात कह दी।

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  5. oye kya baat kahi hai,khoob kaha

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  6. रिश्तों की ख्वाबगोही अनोखी है.. बेनाम रिश्ते भी कुछ नाम छोड़ जाते हैं... सुंदर त्रिवेणी :)

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खुद को छोड़ आए कहाँ, कहाँ तलाश करते हैं,  रह रह के हम अपना ही पता याद करते हैं| खामोश सदाओं में घिरी है परछाई अपनी  भीड़ में  फैली...