Wednesday, March 9, 2011

हाँ हमने मोहब्बत कर के देख ली !






जीने की तलब मर मर के देख ली
हाँ हमने मोहब्बत   कर के देख ली 

जो चाहा जिंदगी से  ,मिला ही नही  
हमने  साँसे   गिरवी  धरके देख ली 

एक चेहरे में   छुपे हैं  चेहरे कितने 
एक सूरत हमने पढके के देख ली 

लहरों को नाज़ था जिसपे बहुत 
वो गहराई हमने उतर के देख ली 

मुझे  जिंदगी के इल्जाम डराते हैं 
बेगुनाही भी 'नजर' कर के देख ली !

'वन्दना' 

10 comments:

  1. छोटी बहर की बहुत ही शानदार गजल लिखी है आपने!

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  2. बहुत बेईमान अहसास होते हैं ये मोहब्बत के..
    सुंदर नज़्म वंदना जी.. :)

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  3. चलिए यह काम भी हो गया .. :):) बहुत खूबसूरत गज़ल

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  4. सच कहा…………यही है ज़िन्दगी की दास्तान्।

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  5. बहुत सुन्दर गज़ल..हरेक शेर अंतस को छू जाता है..

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  6. oho.... kitni vaddi vaddi cheeze try ki tumne.... Jo chaha zindgi se mila hi nahi ...good one !

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  7. बहुत ही शानदार गजल लिखी है आपने| धन्यवाद|

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  8. bahut hi sundar gazal hai....

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  9. बहुत बहुत शुक्रिया आप सभी का ...:):)

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  10. बहुत सुंदर गज़ल ..... जीने की तलब मर मर के देख ली

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