Monday, January 17, 2011

ग़ज़ल




हुई भूल जो ख्वाबो ने ज़मी माँग ली, 
पलकों पे  उम्र भर की नमी माँग ली !

देखकर बदलता मिजाज़ ए जिंदगी,
मासूमियत ने अब सरकशी माँग ली !

मंजूर है रातों को अब ,वीरान आसमां ,
उस चाँद कि हमने भी कमी माँग ली !

जायेंगे जहाँ लेकर जायेगी जिंदगी ,
नजाकत ए वक्त की बंदगी माँग ली !

तहरीर ए जब्त को बोलना आ गया ,
हमने जबसे ग़ज़ल की पैरवी माँग ली !

सरकशी = rudeness  





6 comments:

  1. वाह! दिल का दर्द गज़ल मे उतर आया है ……………शानदार्।

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  2. जज़्बात खूबसूरती से उकेरे हैं

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  3. बहुत बढ़िया. दो आशार तो सहेजने लायक हैं.

    पहला और आखरी .सहेज लिए हैं.

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  4. bohot khoob kaha dost....bohot khoobsurat ghazal :)

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  5. वंदना जी,

    वाह...वाह.....दाद कबूल करें.....ख़ूबसूरत अशआर हैं|

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  6. वंदना जी बहुत अच्छी रचना है आपकी...दाद कबूल करें...

    नीरज

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