Tuesday, January 11, 2011

कारवाँ ए दिल जहाँ डूबता उबरता सा रहता है




सीने में इस तरह से कुछ सुलगता सा रहता है 
दिया बुझ-बुझ के हवा में जैसे जलता सा रहता है 

है आखिर कौन ये परिंदा जो मुझमे बस गया 
इस कफस में हर  घडी क्यूं  तडपता सा रहता है 

मुझे मंजूर नहीं इस तरह  मेरे वजूद का गमन ,
क्यूं मुख्तलिफ * मेरा  जीता मरता सा रहता है 

ये सच है के ख्यालो को मेरे आसमां मिल गया 
मगर जमीं के लिए ये दिल तरसता सा रहता है 

इन शब्दों से खेलकर मैं फ़साना बुनती रही हूँ 
हर लफ्ज अब  मेरा मुझे ही पढता सा रहता है

मोहब्बत फकत* उस एक गहराई का नाम है 
 कारवाँ ए दिल जहाँ डूबता उबरता सा रहता है

ये एक खामोश दरिया है बचकर निकलना 
इसकी गोद  में एक तूफां पलता सा रहता है 



मुख्तलिफ = diffrent और against 

"वन्दना "

12 comments:

  1. वंदना जी,

    सबसे पहले तो आपकी पोस्ट की तसवीर पसंद आई.....
    ग़ज़ल बहुत अच्छी है...शेर बढ़िया लगे .......पर माफ़ कीजिये मुझे कुछ कमीयाँ नज़र आईं -

    तडफता - तड़पता
    जहाँ तक मुझे लगा मुख्तलिफ का मतलब खिलाफ होता है|
    शब्दों की जगह लफ़्ज़ों का इस्तेमाल ज्यादा बेहतर लगता|
    गौद - गोद

    अगर कुछ नागवार गुज़रे तो माफ़ी चाहूँगा....

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  2. इन शब्दों से खेल कर ---- वाह लाजवाब शेर है अच्छी लगी रचना। बधाई।

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  3. ये सच है के ख्यालों को मेरे आसमां मिल गया
    मगर जमीं के लिए ये दिल तरसता सा रहता है

    वाह...क्या बात कही है...खूबसूरत कलाम...बधाई

    नीरज

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  4. बहुत खूबसूरत मर्मस्पर्शी गज़ल..हरेक शेर लाज़वाब..

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  5. bahut bahut shukriyaa aap sabhi ka .apna keemti samay yahan par dene k liye ....abhaar :)


    @ ansaari ji ..thanks aapne ye jaruri samjha ..bahut bahut shukriyaa ..sabhi jaruri baaton par gour kiya jayega :)

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  6. kai baar chup rahne ka matlab kuch na kah pana bhi hota hai...kuch sher to bahut khoobsoorat ban pade hai.....jaise ham kahna chah rahe ho

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  7. bohot hi badhiya ghazal hai....har khayaal khoobsurat hai, sabhi sher umdaa...great job :)

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  8. किस किस शेर की तारीफ करू। हर शेर पहले से बेहतर नजर आता है। बधाई स्वीकार करें।

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  9. बहुत अच्छे अशार हैं.खुदा आपको जोरे कलम और ज्यादा दे

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  10. बहुत बढ़िया वंदना जी .... लिखते रहिए ... शुभकामनाएँ ...

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  11. आदरणीया वंदना सिंह जी
    नमस्कार !

    ये सच है कि ख़यालों को मेरे आसमां मिल गया
    मगर ज़मीं के लिए मेरा दिल तरसता-सा रहता है

    बहुत अच्छी पंक्तियां हैं , बधाई ! पूरी रचना अच्छी लिखी है , और भी श्रेष्ठ सृजन के लिए शुभकामनाएं हैं ।
    इमरान जी के आत्मीयता से भरे सुझाव अपनत्व से लिखे गए हैं ।

    आपका ब्लॉग भी बहुत ख़ूबसूरत है , और चित्र तथा पोस्ट की हुई सामग्री भी । बहुत सुखकर लगा आपके यहां आ'कर …

    >~*~नव वर्ष की हार्दिक बधाई और मंगलकामनाएं !~*~
    शुभकामनाओं सहित
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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