Thursday, January 6, 2011

बोलती नज्मे ..



कभी कभी .
एक खामोश से सफ़र में 
गुजरता है जब दिल 
तंग गलियों से ..
जहाँ.एहसासों के नासूर 
 बिखरे पड़े हैं  .

 निकलता है बचकर आजकल 
सँभल कर चलने का 
अदब आने लगा है शायद
 मगर वो पुराने सूखे हुए
 नासूर.. घातक है 
चुभ ही जाते हैं !

सिहर उठती है रूह ..
.चींख निकलती है उस हर
 बेबोलती  टीस के मूँह से  ...
जब सुनती हूँ कान दबाए तो 
ऐसे में मौन हो जाती हूँ ..
कुछ देर के लिए ,
दिन गुजरता है मेरा 
इसी ख़ामोशी के साथ ..

तब बौलती है अक्सर ये नज्मे
 एक सच्चा झूठ ...
और तुम्हे तो पता है, 
सच कितना कड़वा होता है !!



6 comments:

  1. बेहद दर्द ही दर्द भरा है।

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  2. वंदना जी बहुत खूबसूरत....उर्दू का आपका इल्म अच्छा है.....बहुत खूबसूरती से आपने लफ़्ज़ों में अहसासों को पिरोया है .....बहुत खूब|

    फुर्सत में हमारी दहलीज़ पर भी आएँ -

    http://jazbaattheemotions.blogspot.com/

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  3. सुंदर भाव पूर्ण रचना

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  4. loved the last para...kya likha hai....ek sachha jhooth...awesum!!!

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  5. वाह क्या लिखा है आपने... बहुत गहरी छाप छोडती रचना ...

    आपको और आपके परिवार को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ ...

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