Monday, October 25, 2010

जिंदगी




शहर ,गाँव सी जिंदगी
है धूप छाँव सी जिंदगी !

पथरीली राहों पर जैसे
है नंगे पाँव सी जिंदगी !

मजधारों में गोते खाए
है एक नाव सी जिंदगी !

मक्खी बनकर वक्त कुरेदे
है खुले घाव सी जिंदगी !

खुद से हारे खुद को जीते
है एक दाव सी जिंदगी !

मरते दम मोह ना जाये
है बुरे चाव सी जिंदगी !

बेमोल ही कोई लाद चले
है टके भाव सी जिंदगी!!

वंदना

7 comments:

  1. ज़िंदगी की इतनी विस्तृत विवेचना

    ReplyDelete
  2. बहुत ही सार्थक रचना!
    --
    सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    आपकी पोस्ट को बुधवार के
    चर्चा मंच पर लगा दिया है!
    http://charchamanch.blogspot.com/

    ReplyDelete
  3. शहर ,गाँव सी जिंदगी
    है धूप छाँव सी जिंदगी !

    पथरीली राहों पर जैसे
    है नंगे पाँव सी जिंदगी !

    अच्छा...बहुत अच्छा कलाम है आपका.

    ReplyDelete
  4. बेमोल ही कोई लाद चले
    है टके भाव सी जिंदगी!!

    hmmmn...very true...nice creation :)

    ReplyDelete
  5. वाह....

    सुन्दर यथार्थबोध ...बहुत ही सुन्दर रचना..

    सचमुच ऐसी ही तो होती है जिन्दगी.

    ReplyDelete
  6. बहुत कुछ समझा दिया ज़िंदगी के बारे में ...अच्छी प्रस्तुति

    ReplyDelete

गीत

नयन हँसें और दर्पण रोए  देख सखी वीराने में  पागलपन अब हार गया खुद को कुछ समझाने में  -- काली घटायें  घुट घुट जाएँ  खार...