Friday, October 1, 2010

कोई प्यारा सा खिलौना भी खोकर नहीं देखा




इस चेहरे को अश्को से धोकर नहीं देखा,

अब से पहले खुलकर कभी रोकर नहीं देखा

जिंदगी को खोने पाने का इल्म ही न था,
कोई प्यारा सा खिलौना भी खोकर नहीं देखा

किसी को नफरत भी है हमसे सोचा ही नहीं था,
काँटा किसी के दिल में कभी बोकर नहीं देखा

वो जो कभी मिलता था गले पड़कर मुझसे ,
आज उसी दोस्त ने पीछे मुड़कर नहीं देखा

जाने किस तरह हौंसला करके आया था मैं,
अपने जमीर को खाते यूँ कभी ठोकर नहीं देखा

वंदना
10/1/2010

18 comments:

  1. किसी को नफरत भी है हमसे सोचा ही नहीं था,
    काँटा किसी के दिल में कभी बोकर नहीं देखा
    बहुत सुन्दर गज़ल .. बेहतरीन और अत्यंत भावपूर्ण
    चस्पा किया हुआ चित्र खुद एक गज़ल है

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  2. अंतिम पंक्तियों को बदलने की सलाह है। कुछ यूं कर दें, लय बनी रहेगी।

    जाने किस तरह हौंसला करके आया था मैं,
    यूं ठोकर अपने जमीर को खाते नहीं देखा !

    आपके कलम को सलाम।
    http://chokhat.blogspot.com/

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  3. ऐसे ही कोई हार मान के कोई बैठता है भला?

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  4. किसी को नफरत भी है हमसे सोचा ही नहीं था,
    काँटा किसी के दिल में कभी बोकर नहीं देखा
    व़न्‍दनाजी अच्‍छी गजल है, सभी शेर बढिया हैं, बधाई।

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  5. जो लिखते है वो ऐसा, बेशक जिंदगी देखी तो होगी,
    कैसे मान लें हम, आपने खुद को डुबोकर नहीं देखा ..

    बहुत ही उम्दा ग़ज़ल लिखते रहिये ....

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  6. बहूत खूब ............ आप को नज्मकारी की उम्दा समझ दिखाई देती है

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  7. बहुत सुन्दर गज़ल्……हर शेर खूबसूरत्।

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  8. बहुत सुन्द अभिव्यक्ति!
    --
    दो अक्टूबर को जन्मे,
    दो भारत भाग्य विधाता।
    लालबहादुर-गांधी जी से,
    था जन-गण का नाता।।
    इनके चरणों में श्रद्धा से,
    मेरा मस्तक झुक जाता।।

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  9. Beautiful as always.
    It is pleasure reading your poems.

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  10. जाने किस तरह हौंसला करके आया था मैं,
    मैंने अपने जमीर को यूँ खाते ठोकर नहीं देखा
    ....................गजब कि पंक्तियाँ हैं ...

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  11. जिंदगी को खोने पाने का इल्म ही न था,
    कोई प्यारा सा खिलौना भी खोकर नहीं देखा

    दिल का दर्द साफ झलक रही है इस रचना मे। बहुत अच्छी लगी कविता। बधाई

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  12. किसी को नफरत भी है हमसे सोचा ही नहीं था,
    काँटा किसी के दिल में कभी बोकर नहीं देखा

    बहुत दर्द भरा है गज़ल में तो आह ही निकलेगी.
    गज़ल के तौर पर बहुत सुंदर गज़ल जो सीधी मन पर वार करती है.

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  13. किसी को नफरत भी है हमसे सोचा ही नहीं था,
    काँटा किसी के दिल में कभी बोकर नहीं देखा

    वो जो कभी मिलता था गले पड़कर मुझसे ,
    आज उसी दोस्त ने पीछे मुड़कर नहीं देखा

    sabhi ashaar kamaal hain...haan last wala pawan ji ke according theek karlo...cheers

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  14. किसी को नफरत भी है हमसे सोचा ही नहीं था,
    काँटा किसी के दिल में कभी बोकर नहीं देखा


    बहुत खूबसूरत गज़ल ...

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  15. bahut bahut shukriyaa aap sabhi ka :)

    @ pavan ji ....ye ghazal meter k hisab se to sahi nahi hai par fir bhi maine Radeef or Kaafiyaa nibhane ki koshish ki hai ...or agar last vala sher change kiya to ..kafiyaa Bigad jayega :(.....dhanyavaad :)

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  16. जिंदगी को खोने पाने का इल्म ही न था,
    कोई प्यारा सा खिलौना भी खोकर नहीं देखा ...

    how deeply you write!!!...i'm amazed always!!!

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  17. मेरे ब्लॉग पर इस बार ....
    क्या बांटना चाहेंगे हमसे आपकी रचनायें...
    अपनी टिप्पणी ज़रूर दें...
    http://i555.blogspot.com/2010/10/blog-post_04.html

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  18. वो jo kabhi milta tha gale padkar mujhse ,
    aaj usi dost ne peechhe mudkar नहीं dekha

    wah ! bilkul sahi kaha hai yahi to aaj ki katu sachchai hai

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