Friday, July 30, 2010

त्रिवेणी






जिन्दगी के कितने पर्वत अभी और चढ़ने हैं
कितने गमगीन सागर अभी बाकी उतरने हैं,

मुझे मेरी माँ कि आँखों में सब साफ़ दिखाई देतें हैं |


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15 comments:

  1. एहसास की यह अभिव्यक्ति बहुत खूब

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  2. sanjay ji ..bahut bahut shukriyaa aapka yahan tak aane k liye or sarahne k liye ......
    thanks again :)

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  3. माँ की आँखें जैसे भविष्य की आईना हों !

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  4. मां की आँखें बिना बोले कितना कह जाती है ना ..!

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  5. wow...kya dhaanso tyoe triveni likhi hai superb yaar

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  6. वाह.. त्रिवेणी ने वाकई धार दी है..

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  7. Waaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaah

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  8. Waaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaah

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  9. @ all ....bahut bahut bahut shukriya aap sabhi ka yahan tak aane or sarahne ke liye :)

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  10. neer ...liked ur itni lambi wah hehe thnks :)

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  11. triveni ..........kyun bani hai ?........ganga ,jamuna aaur sarswati tino ka ek aadhura sangam ke bichhade khali pan ko ki talasha ka gahara prayas

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  12. कितना कुछ कह गयीं यह पंक्तियाँ..!!!

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