Friday, February 26, 2010


सितारों कि इस महफ़िल में चाँद तन्हा सा क्यूं है
खामोश है लेकिन इसके होठो पर ये शिकवा सा क्यूं है

तेरे ही दम से हैं ये आसमां कि रोनके.. मैं हैरान हूँ
सबकी आँखों का नूर आज खुद से खफा सा क्यूं है

कुछ पाकर के है खोना कुछ खोकर के है पाना
कोई समझाए जरा जिन्दगी एक जुआ सा क्यूं है

उन आँखों कि वो मस्ती मदहोश कर गयीं थी
आईना पूछ बैठा इन आँखों में ये नशा सा क्यूं है

कुछ जल जल कर बुझता रहा सीने में मेरे
कोई क्या जाने के इन आँखों में ये धुंआ सा क्यूं है

वो एक सख्स जो जुदा सा है ज़माने भर में
मेरा कोई नहीं .....फिर भी खुदा सा क्यूं है..

3 comments:

  1. Amazinggggggg vandu....thats tooo good.....bahut saare sawal pooch daale zindagi se ek saath.

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  2. वो एक सख्स जो जुदा सा है ज़माने भर में
    मेरा कोई नहीं .....फिर भी खुदा सा क्यूं है..

    कमाल का शेर है .... बहुत खूब .......
    आपको और आपके समस्त परिवार को होली की शुभ-कामनाएँ ...

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  3. वो एक सख्स जो जुदा सा है ज़माने भर में
    मेरा कोई नहीं .....फिर भी खुदा सा क्यूं है.......superb....wonderful write..

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