Friday, July 3, 2015

आसमां और जमीं



नीचे जमीं है
ऊपर आसमां
लगता है जैसे
मैं इन दोनों के
बीच कहीं नही हूँ

मैं हूँ तो कहाँ हूँ
किस जगह की हूँ
किसके लिए हूँ
अगर कुछ है
इस छण, तो
सिर्फ एक डर  है
खुद को खो देने का डर
इस आसमां में जहाँ
मेरे मौन के सन्नाटों सी
एक वीरानी है
या उस जमीं में जहाँ
मेरे ज़हन की बेचैनियों के
शोर सा कोलाहल है

मैं ठहरना चाहती हूँ
इन दोनों के बीच कहीं
कोई केंद्र तो होगा
मेरे दिल के किसी
कोने सा खाली

मैं ठहर जाना चाहती हूँ
एक ऐसी जगह पर जहाँ
हवाएं भी मुझसे ला-ताल्लुक सी हो !
जहाँ मुझसे मेरे होने की
गवाही न तलब की जाए !
जहाँ मेरी नींदों को
सपनो से न तोला जाएँ!
जहाँ हसरते न लाचार हों
जहाँ जिंदगी कोई
 तिजारत न जानती हो
जहाँ सब कुछ ऐसा ही हो
जैसा दिखाई पड़े
जहाँ कोई सपना
आखों में तैरता न हो
जहाँ कोई भी आहत
दिल को बेचैन न करती हो
जहाँ कोई उम्मीद आखों में
पानी बनकर न ठहरे
जहाँ सोच के धागे
कुछ भी न बुनना जानते हों
बस मैं ठहरजाना चाहती हूँ
अपने हिस्से की जमीं में
अपने आसमान के नीचे ! 

~ वंदना 

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