Tuesday, February 17, 2015

वो बेबाक सी लड़की


अक्सर जब उलझी हुई 
मैं सोचो में तुम्हारी 
खुद से खीज उठती हूँ 

जब खामोशियाँ मुझको 
गहराई का हवाला देकर 
पैदा करती हैं मुझमें 
डूब जाने का डर 

जब गले की रुदन 
मुट्ठी में कैद 
उँगलियों में उतर आती है  

तमाम ज़हमतों के बाद 
जब सुलझ ही नही पाते 
मेरी साँसों में 
अटके हुए मिसरे

जब चाहकर भी जुबाँ 
दिल का साथ नही देती 
जब मेरी आवाज़ 
चुप्पियों के लिबाज़ पहन 
दफ़न हो जाती हैं कहीं 

तो अक्सर याद आती है मुझे 
मुझमें  वो बेबाक सी लड़की !

 ~ वंदना  

10 comments:

  1. बहुत ही मार्मिक रचना . .. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुती ... वाह!
    मेरे ब्लॉग पर आप सभी लोगो का हार्दिक स्वागत है.

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 19-02-2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1894 पर दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  3. काफी हद तक इन शब्दों के मायने महसूस किये।
    बहुत अच्छी रचना
    आभार

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  4. बहुत सुन्दर...

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  5. सुंदर प्रस्तुति

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  6. bahut bahut abhar aap sabhi ka ..:)

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  7. सुंदर अतिसुंदर।

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