Wednesday, June 20, 2012

त्रिवेणी




हर बार भरम रह जाता  है इबादत के इशारों में 

कितनी पलकें हार गयी कुछ ..ढूँढत ढूँढत तारों में 


खो गए कितनी दुआओं के सिक्के ए चाँद तेरे गलियारों में !


वंदना 

5 comments:

  1. बहुत उम्दा!
    शेअर करने के लिए आभार!

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  2. वाह: लाजवाब...वंदना जी..

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  3. बहुत खूब...
    बहुत सुन्दर,,,,
    :-)

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तुम्हे जिस सच का दावा है  वो झूठा सच भी आधा है  तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती  जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं  कोरे मन पर महज़ लकीर...