Monday, August 8, 2011

पतझड़ में कुछ फूल खिले रह गये


दर्द के बाकी   ये सिलसिले   रह गये ,
पतझड़ में कुछ फूल खिले   रह गये...!


कैसी शिकायत  अब कौन से  शिकवे 
दिल में होके दफ़न सब गिले रह गये !


उड़ गये कुछ  परिंदे छोड़ कर बसेरा 
झूलते डाल पर  ये घौंसले   रह गये .!


क्यूं   खो गया जाने जोम* ए रफाकत 
क्यूं  दरमियाँ  अब ये फासलें  रह गये !


टूटते  रिश्ते का हुस्नएआखिर यही था 
बात करनी थी मगर होंठ सिले रह गये !




- वंदना

जोम ए रफाकत = दोस्ती का घमंड
हुस्न ए आखिर = अंतिम सुंदरता 

11 comments:

  1. बहुत ही खुबसूरत ग़ज़ल....

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  2. वाह: बहुत सुन्दर गजल.....

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  3. ek sachhai,,,,mam
    aankhe bhar aayi kasam se
    aise hi likhti rahiye
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  4. वंदना जी,बहुत ही भावनापूर्ण,संगीतमय और सच को सामने लाती गजल.

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  5. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा मंच

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  7. बहुत उम्दा ग़ज़ल...
    सादर...

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  8. मतला शानदार और जानदार है, वाह!

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