Monday, June 20, 2011

धूल


कितने रेतीले हैं 
जिंदगी तेरे रास्ते ..
और कितनी बेबाक हैं 
वक्त कि हवाएँ 

वो एक झोका जिसकी 
कोई दिशा नही थी ..
मगर मुझे दिशा हीन कर गया 

आज भी बाकी हैं 
मुझमे कहीं वो धूल ..
जो किरकती है 
मूँह में किसी 
अनकही बात कि तरह  ..

जो महसूस होती है 
इन साँसों मे 
वीणा के टूटते तारों
 कि खनक कि तरह 

जो जमी हुई है 
जहन कि गीली 
जमीन पर साहिल के 
रेत कि तरह  

जो बहुत चुभती है
 इन आँखों में ..
तपती धूप मे
 बंजर रेती कि तरह ..

 सुना है .जिंदगी में .अच्छे और बुरे 
हर मौसम को गुजर जाना होता है 

बारिशों का मौसम  आये 
इससे पहले लौटाना चाहती थी 
तुम्हारे हिस्से कि वो धूल जो 
मुझ  में रमी रह गयी थी 

चंद घंटो के उस सफ़र में 
अनचाहे से एहसासों कि 
वो तमाम किरचें
 जिन्हें मैं मसलते हुए 
बिखेरती आयी थी 
उस बहुत शोर करते हुए 
शहर कि विरानगी के नाम ..

वो तुम्हारे हिस्से कि धूल थी 
जिसमे मेरा कुछ भी 
बाकी नहीं छोड़ा मैंने 
ना आँसू , न सिसकियाँ 
कुछ भी तो नहीं ..
ताकि तुम्हे न चुभ सके कुछ !!


वन्दना 



9 comments:

  1. आज भी बाकी हैं
    मुझमे कहीं वो धूल ..
    जो किरकती है
    मूँह में किसी
    अनकही बात कि तरह ..

    मन के गहन भावों को कहती अच्छी प्रस्तुति

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  2. उफ़ मोहब्बत हो तो ऐसी अब भी उसी की चिन्ता।

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  3. सुन्दर भाव सुन्दर अभिव्यक्ति ...

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  4. us dhool ko pashaan ka roop lene se pahle apne jehan se chhitak do varna tamaam umr is paashaan ka bojh uthana mushkil ho jayega.

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  5. Heart touching poem with marvelous grace

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  6. तुमने यू. एस. से जों धूल उड़ाई है ......उसका गुबार हिन्दुस्तान तक आया है .....आँख अभी तक मसल रहे हैं....बहुत चुभती हैं किरचें ..सच्ची! :-)

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  7. ये कविता दुनिया मे वंदना जी के अतिरिक्त किसी और की हों भी नहीं सकती थी .....

    ये हुनर सिर्फ आप ही के पास है वन्दना जी शब्दों को जादू मे बदलना

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  8. akhiri para to jadoo hai....bahut hi zyaada achha :)

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