Monday, April 4, 2011

सलीका जीने का ये दीपक सिखा रहा है







जलते रहकर उजालो को दुआ देते रहो 
है यही दस्तूर तो आप भी निभाते रहो 

सलीका जीने का ये दीपक सिखा रहा है 
अपने हिस्से के अँधेरे को संजोते रहो 

तुमसे मिलती है किरदारों को जिंदगी 
खुद में खोकर कहीं , फ़साना होते रहो 

जरूरी है खुद पर ये एतबार  बना रहे 
तुम आईने से रोज़ आँख मिलाते  रहो 

हमने तहरीर को भी सच होते देखा है 
तुम बादलों  में कोई चेहरा बनाते रहो 


'वंदना '






14 comments:

  1. बहुत सुन्दर भाव्।

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  2. सलीका जीने का ये दीपक सिखा रहा है
    अपने हिस्से के अँधेरे को संजोते रहो


    बहुत खूब ...अच्छी प्रस्तुति

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  3. बहुत सुन्दर गज़ल...हरेक शेर लाज़वाब ...सुन्दर भाव

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  4. Last sher kamaal hai

    "Hamne tahreeron ko sach hote dekha hai
    badlon mein ko chehra banate raho "

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  5. बहुत ही खुबसूरत शेर, दिल ने कहा बहुत खूब ....

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  6. बड़ी अच्छी गज़ल बन पड़ी है..

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  7. वंदना जी , मजा आ गया ...फसाना होते रहो ..क्या बात है ...

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  8. Lajawaab sher hain is gazal mein ... bahut khoob ...

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  9. बहुत बेहतरीन ग़ज़ल| धन्यवाद|

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  10. aakhir ke dono sher bahut bahut pasand aaye. umda gazal ke liye badhayi.

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  11. last one is fabulous....aap yunhi hamein acche acche nazm sunaate raho :D

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  12. vandana ji,
    achhi gazal hai aapki.

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  13. bahut pyari rachna

    badalon me tashwir banate raho ..jo khud chalaymaan rahte hain...par har zarre me pehchaan dundho...judo aur chalte raho...

    bujho to khud deepak ban kar ...

    aap mere blog par bhi aayen
    http://abhishekinsight.blogspot.com/2011/04/blog-post_1562.html

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