Wednesday, December 29, 2010

मंजिलें छूट गयीं और सबात* आया भी नहीं




जो कबूला भी नहीं ..जुठ्लाया भी नहीं 
जो जताया भी नहीं और छुपाया भी नहीं..

उस प्यार कि कोई ..इन्तहा तो न थी 
वो लबो पे मगर कभी आया भी नहीं.. 

तकती थी शाम ए तन्हाई रास्ता जिसका 
वो आया भी नहीं .हमने बुलाया भी नहीं.. 

मैं ही पागल जाने  किस दर्द में जीता रहा,
उस रहनुमा ने कभी दिल दुखाया भी नही..

मुनासिब तो न था ये कर्ब ऐ हिज्र* लेकिन, 
फुर्सत से कोई लम्हा मगर बिताया भी नहीं 

  टूटते देखें  हैं रोज रातों में ,तारे गगन के,  
माँगकर  दुआ दिल को   बहलाया भी नहीं.. 

अजब  खामोश सा सफर है ये इश्क यारों, 
मंजिलें छूट गयीं और सबात* आया भी नहीं.. 



कर्ब ए हिज्र = जुदाई का गम
सबात = ठहराव

13 comments:

  1. सच कह रही हैं ये सफ़र ना जाने कैसा है और कहाँ जाकर ठहरेगा…………दिल को छू गयी।

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  2. मैं ही पागल किस दर्द में जीता रहा|
    उस रहनुमा ने तो कभी दिल दुखाया भी नहीं|

    बेहतरीन शे'र वंदना जी| बधाई|
    दिनांक ३ से ५ जनवरी के दरम्यान ओबिओ पर तीसरे महाएवेंट का आयोजन किया गया है| आप मित्र मंडली सहित पधार कर साहित्य रस पॅयन कीजिए| ज़्यादा जानकारी के लिए लिंक्स दे रहा हूँ:-
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  3. kasam se! agar kisi 3rd ko padhwaya jaaye .....wo fo kisi hi-fi type shayar ka naam lega.... Log ham jaiso ko underestimate kyon karte hain ? :-)

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  4. सुभानालाह........दाद कबूल करें|

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  5. आपको भी नया साल बहुत-बहुत मुबारक हो...

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  6. उस प्यार की तो कोई इंतिहा नहीं थी ...मगर कभी लबों पर आया ही नहीं ..
    अजब खामोश सा सफ़र है ...बस सफ़र ही सफ़र है ...कोई मंजिल नहीं ...
    खूबसूरत रचना !

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