Wednesday, August 18, 2010

Ghazal





जिन्दगी के इल्म पर एतबार नहीं होता
मगर आईने में देखकर इनकार नहीं होता

हर एक जख्म को मरहम कि तलाश होती है
किसी को कभी किसी से प्यार नहीं होता..

दिल कि तन्हाई बज्म ए एहसास तलाशती है
यहाँ कोई किसी का तलबगार नहीं होता..

डूब भी जाया करते हैं अक्सर लहरों से खेलने वाले
मगर साहिल पे बैठ कर तो दरिया पार नहीं होता..

आईने कि क्या मजाल मुझे कोई इल्जाम दे
अपनी ही नजर में अगर मैं गुनहगार नहीं होता..

10 comments:

  1. डूब भी जाया करते हैं अक्सर लहरों से खेलने वाले
    मगर साहिल पे बैठ कर तो दरिया पार नहीं होता..
    बेहतरीन।

    ReplyDelete
  2. जिनके बँगलों में रहें, सुन्दर-सुन्दर श्वान।
    उनको कैसे भायेंगे, निर्धन,श्रमिक,किसान।।
    यथार्थ चित्रण।

    ReplyDelete
  3. Na jane kyon laga ki pahle bhi padha hai...Lekin fir refresh ho gai....May be tumne FB par dala ho

    ReplyDelete
  4. आईने कि क्या मजाल मुझे कोई इल्जाम दे
    अपनी ही नजर में अगर मैं गुनहगार नहीं होता..

    :) good one

    ReplyDelete
  5. बेहद शानदार गज़ल्………………हर शेर दिल को छूने वाला।

    ReplyDelete
  6. जिन्दगी के इल्म पर एतबार नहीं होता
    मगर आईने में देखकर इनकार नहीं होता

    हर एक जख्म को मरहम कि तलाश होती है
    किसी को कभी किसी से प्यार नहीं होता..


    खूबसूरत पन्तियाँ....काफी दिनों के बाद आपके ब्लॉग पर आया ..एक अच्छी रचना से सुकून मिला मन को.

    ReplyDelete
  7. हर एक जख्म को मरहम कि तलाश होती है
    किसी को कभी किसी से प्यार नहीं होता..

    बहुत खूब .. ग़ज़ब का शेर है ये ... लाजवाब है पूरी ग़ज़ल ...

    ReplyDelete
  8. ऐतबार तो इन साँसों का भी नहीं है,
    अपनी हो कर भी पराई सी जान पड़ीं,

    आज आ रही हैं तो जी लेते हैं,
    कल आने कि फुर्सत मिले इन्हें, क्या पता?

    interesting blog space.

    Cheers
    Blasphemous Aesthete

    ReplyDelete
  9. bahut bahut shukriyaa aap sabhi ka yaahan tak aane k liye ....:)

    ReplyDelete

गीत

नयन हँसें और दर्पण रोए  देख सखी वीराने में  पागलपन अब हार गया खुद को कुछ समझाने में  -- काली घटायें  घुट घुट जाएँ  खार...