Friday, May 14, 2010

याद आता है





वो गाँव .....वो गली......... वो घर याद आता है
छोड़ आयें है जहाँ बचपन वो शहर याद आता है..

लेती है यहाँ जिन्दगी हर रोज नया इम्तिहान
बुजुर्गो कि दुआंओ का वो असर याद आता है ..

फुर्सत के दिन ..जब यूँ अकेले में गुजरते हैं
मुझे मेरी नानी का बहुत .वो घर याद आता है..

वो कबूतर से प्रेम ....और कोएँ से दुश्मनी
बूढ़े नीम पर चिड़ियों का वो बसर याद आता है ..

तारो कि महफ़िल पे...... वो चांदनी का पहरा
चाँद संग अपनी नींदों का वो सफ़र याद आता है..

रो लेते हैं जी भरके मगर चैन नहीं मिलता
जितना भुलातें है उतना. वो बेखबर याद आता है ...

जाने क्यूं कोई ख़्वाब बुना था इन गुस्ताख आँखों ने
मासूम दिल कि तबाही का वो मंजर याद आता है...

8 comments:

  1. जाने क्यूं कोई ख़्वाब बुना था इन गुस्ताख आँखों ने
    मासूम दिल कि तबाही का वो मंजर याद आता है...tabahi nahi yaar...socho bin yaadon ke zindgi kya hoti ? Yaadein dooriya mitati hain zaroori hain.....very touchy.

    ReplyDelete
  2. रो लेते हैं जी भरके मगर चैन नहीं मिलता
    जितना भुलातें है उतना. वो बेखबर याद आता है ...

    _______________________________________________


    अत्यंत ही सुन्दर और मनभावन प्रस्तुति !
    हार्दिक आभार !

    ReplyDelete
  3. बहुत सुन्दर भाव ....
    किसी को भूलने के लिए उसे याद करना पड़ता है .. और जो याद रहे उसे भूलें कैसे ... अनोखा गाँव है ये ...

    ReplyDelete
  4. o tere ki ....zabardast improvment hai vandu..kya mast nostalgic ghazal likhi hai ...waaaah

    ReplyDelete
  5. ye daulat bhi le lo...ye shohrat bhi le lo...mamar mujhko lauta do wo kaagaz ki kashti,wo baarish ka paani.....

    beautifully written!!!.....i m sry for being so late...exams were going on...

    ReplyDelete
  6. Yaad aata hain..is nice

    ReplyDelete
  7. Waakei mein zindagi ka wo beeta safar bahut yaad aata hai.
    Bahut hi dhansooooooooo...... :)

    ReplyDelete
  8. वो गाँव .....वो गली......... वो घर याद आता है
    छोड़ आयें है जहाँ बचपन वो शहर याद आता है..
    ....sach mein gaon bahut yaad aate hai shahar kee bhaagdaud ki jindagi mein..
    Sundar bhavpurn rachna ke liye dhanyavaad.

    ReplyDelete

गीत

नयन हँसें और दर्पण रोए  देख सखी वीराने में  पागलपन अब हार गया खुद को कुछ समझाने में  -- काली घटायें  घुट घुट जाएँ  खार...