Thursday, February 16, 2017

गीत


नयन हँसें और दर्पण रोए 
देख सखी वीराने में 
पागलपन अब हार गया
खुद को कुछ समझाने में 
--

काली घटायें 
घुट घुट जाएँ 
खारे पानी 
नयन समाएं। 
मन में मुंडेर पे 
बैठ परिंदा 
विरह के नित 
गीत सुनाए। 
इसके हवा ने पंख कुतर लिए 
ये टूटा नही... गिर जाने में 


नयन हँसें और दर्पण रोये 
देख सखी वीराने में 

--

कैसे है ये 
रोग वे माए 
रो -रो रतियाँ 
नयन गंवाए।
जुड़के न टूटे 
डोर ये मन की 
साँसों विच कोई 
अलक जगाये। 

मन बैरागी ,भेद न समझे 
जीने, और... मर जाने में। 

नयन हँसें और दर्पण रोये 
देख सखी वीराने में
पागलपन अब हार गया 
खुद को कुछ समझाने में। 






2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (19-02-2017) को
    "उजड़े चमन को सजा लीजिए" (चर्चा अंक-2595)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

    ReplyDelete
  2. wah....realy realy realy nice poem...


    if u contact with me than...
    mujhe achhha lagega ,....
    plz meri prerna banniye..
    ,mujhse bhi kuch kahiye ..

    chetangochar1998@gmail.com

    ReplyDelete

गीत

नयन हँसें और दर्पण रोए  देख सखी वीराने में  पागलपन अब हार गया खुद को कुछ समझाने में  -- काली घटायें  घुट घुट जाएँ  खार...