Thursday, April 28, 2011

ग़ज़ल ---






मुझे इस गुनाह का तुम  ये इनाम दे दो 
मुझे हर सजा कबूल है बस इलज़ाम दे दो ..

पता नहीं    ये कौन सी  बेबसी है दिल की
इस आवारगी को अब जो चाहे नाम दे दो ..

इक खुदगर्जी कहीं मुझमें करती है इल्तजा 
मुझे मेरे  वही पुराने  तुम सुबह शाम दे दो 

लम्हा -लम्हा  जिंदगी कह रही है मुझसे 
गुमराहियों को तुम भी अब अंजाम दे दो 

मेरी जिंदगी कि वो अनमोल सी सौगातें 
सब लाद ले चले हो ,कुछ तो दाम दे दो 


दुनिया में प्रीत की  तुम रखलो लाज मोहन 
एक मीरा को उसका  घन श्याम  दे दो 


वक्त लौटा नहीं सकता गुज़रा हुआ बचपन 
वो खट्टे मीठे जामुन वो कच्चे आम दे दो 

बख्शी है खुदा ने नियमत  ए परवाज़ तुम्हे 
इस सफ़र को 'वंदना' तुम  एक मुकाम दे दो 


- वन्दना 
28th April 2011



20 comments:

  1. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (30.04.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

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  2. बहुत ही सुन्दर गज़ल्।

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  3. क्या यार गज़ब हो तुम भी ....कोई मनुफैक्चुरिंग यूनिट अन्दर लगा रखी है क्या.....प्रोडक्शन गज़ब का जा रहा है....और तस्वीर तुम्हारी क्यों नहीं ...या फिर ऋचा जी से गवाने का चक्कर है ....मामला क्या है साफ़ किया जाए :-)

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  4. kya baat hai ,najm jo sidha samvad karti huyi gaharayiyon men utarati huyi . bahut mohak ,mahak bikherati huyi ji .
    shukriya ji

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  5. बहुत सुन्दर गजल है मैने आप के सभी ब्लांग पढ़े बहुत सुन्दर है। मेरे ब्लांग में भी आप आये तो मुझे खुशी होगी धन्यवाद…

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  6. Kya gazab ke sher likhe hain .... lajawaab gazal ...

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  7. कच्चे पक्के जामुन और कच्चे आम की तरह इस ग़ज़ल के लुत्फ़ का क्या कहना...दाद कबूल अक्रें
    नीरज

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  8. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 03- 05 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  9. बहुत खूबसूरत अशआर हैं सभी ! किसी एक की तारीफ़ दूसरे के साथ नाइंसाफी होगी ! लेकिन इसका जवाब नहीं है !
    इक खुदगर्जी कहीं मुझमें करती है इल्तजा
    मुझे मेरे वही पुराने तुम सुबह शाम दे दो !
    बधाई क़ुबूल करें !

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  10. इस आवारगी को अब कोई नाम दे दो ...
    मेरी वही पहली सी सुबह शाम दे दो ...
    खूबसूरत इल्तिजा अशआरों में !

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  11. वक़्त लौटा नहीं सकता गुज़रा हुआ बचपन।

    सही है। बहुत बधाई ।

    ॥ सुलभसौख्यं इदानीं बालत्वं भवति ॥

    बचपन में सुख सुलभ होता है..!!

    मार्कण्ड दवे।
    http://mktvfilms.blogspot.com

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  12. 'वक्त लौटा नहीं सकता गुजरा हुआ बचपन

    वो खट्टे मीठे जामुन वो खट्टे आम दे दो '

    ......................वाह ! बहुत जानदार शेर

    ....................उम्दा ग़ज़ल

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  13. क्या बात है वंदना जी
    कसम से अश्क बह निकले

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  14. बहुत ख़ूबसूरत गज़ल..

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  15. u are really fabulous... :)

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  16. @ mousumi ...thankss for compliment dear :)

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  17. Dil ki is aavargi ko ab jo chahe naam de do

    Vandna ji sach maniye Mohabbat ke aakhri ahasas ko spars kar gai aapki rachana

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  18. bahut khoob

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