Saturday, September 26, 2009

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सफ़र आसमानों में बख्शे है मूझे, तो ऐ जिन्दगी उड़ने का होंसला तो दे ..

अपनी उड़ती आशाओ के बिखरते पंखो को समेटू जहां, मूझे वो घोंसला तो दे..




अक्सर चांदनी रातो में बादलों से

ख्वाबो कि एक ओढ़नी बुना करती हूँ ..

निगोडी निंदिया सितारे जड़ने नहीं देती ,

और अलारम कि टिक टिक एक पल में उधेड़ देती है...,,

महफिलों कि वीरानियों में हम खुद को समेटा करते है..

तन्हाई हमें कुछ इसकदर बिखेर देती है...........*




लुटाई है मैंने हस्ती तड़पते दिल कि आँहों पे ...

उजड़ी है अरमानो कि बस्ती खुअबो के चोराहो पे ...

तिजारत कि इस दुनिया में ,अब कैसे प्रीत के मेले,,

के मोहब्बत हो गई सस्ती ..

सह-सहके तकाजे दुनिया कि फरेबी निगाह्नो के..

10 comments:

  1. good one.. first one is fabulous .....keep writing :-)

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  2. तिजारत कि इस दुनिया में ,अब कैसे प्रीत के मेले,,
    के मोहब्बत हो गई सस्ती ..
    सह-सहके तकाजे दुनिया कि फरेबी निगाह्नो के.

    bahut khoob.

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  3. बहुत सुंदर कविता है मजा आ गया पढ़कर

    संजीव कुमार बब्बर

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  4. बहुत अच्छा लिख रही हो
    अगर पोस्ट करने से पहले थोड़ी मेहनत हो जाये
    तो सोने में सुगंध आने लगे

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  5. लुटाई है मैंने हस्ती तड़पते दिल कि आँहों पे ...
    बहुत अच्छे।।

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  6. doosri kavita bahut jyada pasand aayi mujhe...

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  7. This comment has been removed by the author.

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  8. Word selection ka jawab nahi...mere se kyun nahi hota aisa selection...hunh!! :P

    Kool hai ji...!;)

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