वो सागर से दो नयना ....
किसी चंचल हिरन की तरेह ......कस्तूरी को ढूंढते ,
जो लागे है बड़ी प्यारी मगर समझ में नही आती ....
मुझे दो परिंदों की जैसे वो गुफ्तगू सी नजर आयी ,
उन नैनो में बेचैनिया थी
या कोई अधूरा सा सकून था
एक सांचा आईना थे वो
या मेरी आँखों का जूनून था
मैं अनपढ़ कवाल कोई ......और वो
गजल की जैसे एक किताब नजर आयी
गीत, ग़ज़ल, नज्म ..ये सब मेरी साँसों कि डोर, महंगा पड़ेगा बज्म को मेरी खामोशियों का शोर ! --- "वन्दना"
Thursday, May 21, 2009
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तुम्हे जिस सच का दावा है वो झूठा सच भी आधा है तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं कोरे मन पर महज़ लकीर...
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वफायें ..जफ़ाएं तय होती है इश्क में सजाएं तय होती हैं पाना खोना हैं जीवन के पहलू खुदा की रजाएं.. तय होती हैं ये माना... के गुन...
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सोचती हूँ इस फ़साने का अब कोई अदम लिख दूं क़त्ल ए किरदार से पहले एक आखरी नज्म लिख दूं .... जिंदगी नयी शर्तों पर फिर जीने के मोहलत ले आय...
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कुछ रिश्ते बेनाम होते हैं कुछ रिश्तों के नाम होते हैं बेनाम रिश्ते में कोई शर्त नहीं होती सिर्फ प्रेम होता है वो क्यूं हैं .क्या ...
Waah Vandana....naynon ki bhasha bakhubi vyakt ki hai aapne.
ReplyDeletesunder rachna.
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