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Thursday, November 28, 2013

ग़ज़ल




लाख चाह कर भी पुकारा  जाता नही है 
वो  नाम अब  लबों पर     आता नही है 

इसे खुदगर्जी कहें या बेबसी का नाम दें 
चाहते हैं पर अना  से हारा जाता नही है 

दिल ख़्वाबों में भटकता एक बंजारा है 
कि जिसके हिस्से में सबात आता नही है  

छुप गया  वो चाँद अब आसमाँ के पीछे 
नूर ए अक्स मगर क्यूँ धुंधलाता नही है 

मुक्कमल दी हैं  हमने सजाएँ  दिल को 
कसूर मगर  इसका समझ आता नही है 

न तुम खफा रहो न किसी को रहने दो 
जो चला जाता है दुबारा आता नही है 

इस बात के एहसास और डर में मरते हैं 
 जिन्दा रहने का हुनर भी आता नही है  !!




~~ वंदना 



Wednesday, March 27, 2013

हम खुद से बाहर कहाँ तक जायेंगे



थक जायेंगे तो यहीं लौटकर आयेंगे 
हम खुद से बाहर कहाँ तक जायेंगे 

झंझोड़ कर जगा दे इस खाब से कोई 
वरना उम्मीदों के पर निकल आयेंगे 

कोई तस्लीम* बाकी हो दरमियाँ अपने 
इतना अगर घुटेंगे तो मर ही जायेंगे !

हर चेहरे पे लिखी है एक ही कहानी 
कितनी आँखों में खुद को पढ़ते जायेंगे 

कबूलते हैं आज अपने हिस्से का सच 
अपने आप से कब तक मुकरते जायेंगे 

जिंदगी तुझको ये पहले से बताना था 
मौत से पहले भी ऐसे सबात*आयेंगे !


वंदना 

Tasleem - greeting , Sabaat - thahraav


Thursday, August 18, 2011

तसव्वुर के मौसम





बचपन कि वो बरसाते
जब स्कूल से आते वक्त 

अक्सर भीगने का लुफ्त 
लेने में   मेरी किताबे भी
भीग जाया करती थी

और फिर मैं धूप का
इन्तजार करती थी
उन्हें सुखाने के लिए

आज समझ आया
चाहत और जरूरत में
कितना फर्क है

बरसातें मेरी चाहत है
और धूप जरुरत !

दुसरे शब्दों में कहूँ
तो तुम वही एक बरसात हो
जिसने भिगो दिया है
मेरे वजूद को ...
और मुझे जिंदगी से
धूप कि तलाश है ..

अजीब बात है
धूप सुखा सकती है
हमारे सीलेपन को
मगर भीगने के
उस सुखद एहसास को नहीं ..
जो हर बरसते मौसम में
 हरा हो जाया करता है ...

" जिंदगी कि ये धूप
और तसव्वुर के मौसम
कौन किस्से हारे
कौन किसको जीते ! 


- वंदना


तुम्हे जिस सच का दावा है  वो झूठा सच भी आधा है  तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती  जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं  कोरे मन पर महज़ लकीर...