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Thursday, November 28, 2013

ग़ज़ल




लाख चाह कर भी पुकारा  जाता नही है 
वो  नाम अब  लबों पर     आता नही है 

इसे खुदगर्जी कहें या बेबसी का नाम दें 
चाहते हैं पर अना  से हारा जाता नही है 

दिल ख़्वाबों में भटकता एक बंजारा है 
कि जिसके हिस्से में सबात आता नही है  

छुप गया  वो चाँद अब आसमाँ के पीछे 
नूर ए अक्स मगर क्यूँ धुंधलाता नही है 

मुक्कमल दी हैं  हमने सजाएँ  दिल को 
कसूर मगर  इसका समझ आता नही है 

न तुम खफा रहो न किसी को रहने दो 
जो चला जाता है दुबारा आता नही है 

इस बात के एहसास और डर में मरते हैं 
 जिन्दा रहने का हुनर भी आता नही है  !!




~~ वंदना 



Friday, May 31, 2013

ग़ज़ल




कोई गीत नये  सुरों में जब गाया जायेगा 
साँसों के साज़ को कैसे भुलाया जायेगा 


धूप है कहीं छांव  कहीं अँधेरा भी होगा 
हमारे साथ कहाँ तक ये साया जायेगा 


तवक्को फकत  एक उदासी का सामान है 
ये बोझ दिल से कब तक उठाया जायेगा 


यूँ हम पर  कोई भी इल्जाम तो नही है 
मगर क्या आइने से पीछा छुड़ाया जायेगा 


न ताल्लुक कम हुआ है न राब्ता ,मगर 
न वो आ सकेगा न हमसे बुलाया जायेगा !



वंदना 



Wednesday, March 27, 2013

हम खुद से बाहर कहाँ तक जायेंगे



थक जायेंगे तो यहीं लौटकर आयेंगे 
हम खुद से बाहर कहाँ तक जायेंगे 

झंझोड़ कर जगा दे इस खाब से कोई 
वरना उम्मीदों के पर निकल आयेंगे 

कोई तस्लीम* बाकी हो दरमियाँ अपने 
इतना अगर घुटेंगे तो मर ही जायेंगे !

हर चेहरे पे लिखी है एक ही कहानी 
कितनी आँखों में खुद को पढ़ते जायेंगे 

कबूलते हैं आज अपने हिस्से का सच 
अपने आप से कब तक मुकरते जायेंगे 

जिंदगी तुझको ये पहले से बताना था 
मौत से पहले भी ऐसे सबात*आयेंगे !


वंदना 

Tasleem - greeting , Sabaat - thahraav


Sunday, February 3, 2013

यूं ही दिल के हर कोने में रहेगा




यूं ही दिल के हर कोने में रहेगा 
तेरा होना    मेरे होने   में रहेगा 

रेत एक रोज़ आईना हो  जाएगी 
ये समंदर साहिल धोने में रहेगा 

खुशबुओं के पर निकल आयेंगे
अब सहरा गुलाब बोने में रहेगा 

फिदरत अपनी बदल  दे ऐ इश्क 
कोई  कब तक पाने खोने में रहेगा 

मौन की तहरीरें गढ़ी जा रही हैं 
दिल टूटी कड़ी  पिरोहने में रहेगा 



- वंदना 

Monday, September 19, 2011

ग़ज़ल





कभी पत्थर बनाती है   कभी लोहा बनाती है 
गर्द ए एहसास कभी उसको खोया* बनाती है 

कुछ खोया है   या पाया है    उसे मालूम नहीं   
अपने वजूद को आसूद* मगर गोया* बनाती है 

सबब मालूम है तस्वीरों कि रफाकत* का मगर 
वो पागल फिर दुआओं में एक चहरा बनाती है 

बेगानी खुशी मुस्कान में,दुआ में दर्द पराये हैं 
वो जिंदगी से आजकल कैसा रिश्ता बनाती है 

देखा है  जिंदगी के  मौसमों  का  बदल  जाना 
वो हर सफ़हे* को यादों का इक आईना बनाती है 

हँसे  तो आँसू हो जाये,   रोये  तो मुस्कान बने 
वो हर जज्बात को जादू का खिलौना बनाती है 

हम इस नादानी को  तजुर्बा ए इश्क  कहते हैं 
वो हर जख्म को  इबादत  का फलसफा बनाती हैं 

- वंदना 




खोया = राख या बरूदा
आसूद = संपन्न 
गोया = जैसे / माना 
रफाकत = साथ 
सफहे = पन्ने 




तुम्हे जिस सच का दावा है  वो झूठा सच भी आधा है  तुम ये मान क्यूँ नहीं लेती  जो अनगढ़ी सी तहरीरें हैं  कोरे मन पर महज़ लकीर...